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Bhagwan Chitragupta के वंशजों को इस बार भी नहीं मिली जगह, आक्रोशित है Kayastha Samaj

Bhagwan Chitragupta के वंशजों को इस बार भी नहीं मिली जगह, आक्रोशित है Kayastha Samaj
Bhagwan Chitragupta के वंशजों को इस बार भी नहीं मिली जगह, आक्रोशित है Kayastha Samaj

भगवान चित्रगुप्त के वंशजों को इस बार भी नहीं मिली जगह, आक्रोशित है कायस्थ समाज 

पटना, 24 नवंबर कायस्थ समाज ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल में उनके प्रतिनधियों की उपेक्षा किये जाने पर चिंता व्यक्त की है।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ 14 मंत्रियों ने शपथ ली है। इनमें से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) कोटे से सात और जनता दल यूनाईटेड (जदयू) कोटे से पांच मंत्री बनें। इसी तरह हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) और विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) कोटे से एक-एक नेताओं को नीतीश मंत्रिमंडल ने जगह दी। कैबिनेट में जातिगत समीकरण का खास ख्याल इस प्रकार रखा गया कि पिछड़ी जाति को समुचित तो सवर्णों में भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत जाति को सांकेतिक जगह मिली है. लेकिन, समस्त प्राणियों का लेखा-जोखा रखने वाले भगवान श्री चित्रगुप्त के पूजनोत्सव के दिन तैयार किये गए नीतीश के मंत्रिमंडल में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की कोर वोटर और भगवान चित्रगुप्त के वंशज कायस्थों को मंत्री के तौर पर कैबिनेट में जगह नहीं मिली है।शिक्षित समाज अपने साथ-साथ देश और समाज की चिंता करते हैं इसलिए वर्त्तमान समय में पिछड़ते जा रहे हैं। ऐसा हीं हाल बिहार में अगड़ी जाति से जुड़े लोगों का हो रहा हैं जो हाशिये पर आ रहे हैं और उनमें सबसे ज्यादा नुकसान या यूँ कहें की उपेक्षा का कायस्थ समाज शिकार हो रहा है।

अगड़ी जाति के लोगों के बारे में कहा जाता है कि इनके लगभग 60 से 70 प्रतिशत वोटर भाजपा के होते है। उसमे भी कायस्थ समाज के वोटर शत-प्रतिशत भाजपा के होते हैं। वर्ष 2020 विधान सभा चुनाव के बाद बने मंत्रिमंडल पर नजर डाले तो सवर्णों की उपेक्षा साफ-साफ़ देखी जा सकती है. सवर्णों में ही आक्रमक रुख अख्तियार करने या वोट को ट्रान्सफर कराने वाली जातियों को सिर्फ लौलीपॉप थमा कर चुप करा दिया गया। सवाल यह है कि यदि टिकट और मंत्रिमंडल में जातीय और सामाजिक समीकरणों की बात हर जगह होती है तो दो-दो उप मुख्यमंत्री में एक स्थान सवर्णों को क्यों नहीं दिया गया ? मंत्रिमंडल में पिछले तीन टर्म में कायस्थ समाज को हिस्सेदारी क्यों नहीं दी गयी ? बिहार भाजपा में चुने गए उपमुख्यमंत्री से वरिष्ठ और सक्रिय और कई नेता हैं तो उन्हें क्यों नहीं जगह दिया गया ? कई सवालों का जवाब दिए बिना भाजपा के वरिष्ठ नेता और केन्द्रीय मंत्री राजनाथ सिंह ने दिल्ली की फ्लाइट क्यों पकड़ ली ? सवाल बहुत सारे हैं पर जवाब न तो जदयू के पास है और न भाजपा के पास।

राजधानी पटना से ऐसे विधायको को स्थान मिलना चाहिए था जो पिछले कई टर्म से विधायक हैं और किसी खास समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं। जदयू के एक प्रवक्ता जो मीडिया में बढ़-चढ़ कर पिछले तीन टर्म से नीतीश कुमार का पक्ष रखते आये हैं उन्हें क्या सिर्फ इसलिए साइड लाइन में रखा गया है कि वे अगड़ी जाति से आते हैं ? ऐसे हीं भाजपा के ही एक विधान पार्षद और मीडिया मैनेजर हैं जो पिछले दो-तीन दशकों से भाजपा के लिए मीडिया मैनेज करते हैं लेकिन भाजपा उनके लिए भी मंत्रिमंडल में जगह मैनेज नहीं कर पायी हैं. ऐसे हीं और विधान पार्षद और नेता हैं जिन्हें हर बार दरकिनार कर दिया जा रहा है. इन सभी नेताओं की अपने समाज में अच्छी पकड़ के बावजूद सत्ता में पकड़ नहीं बन पाई।लोकतंत्र के आंकड़ो में कायस्थ जाति कमजोर होती जा रही है। कायस्थ समाज “हम दो हमारे दो” या अब कहिये कि “सिर्फ एक” हीं
परिवार की परिभाषा बनती जा रही है। इस कारण कायस्थ जाति राजनीतिक और सामाजिक रूप से पिछड़ते जा रही है. राजनितिक रूप से हाशिये पर आ चुकी कायस्थ जाति की कमजोर होती पहचान का एक मुख्य कारण यह भी है कि ये जाति अपने उपेक्षा पर भी आक्रामक नहीं होती है।

पिछले 30 सालों में लगभग हाशिये पर आ चुकी कायस्थ समाज का वजूद लगभग ख़त्म होता जा रहा है. 90 के दशक में जब लालू प्रसाद यादव का शासन आरम्भ हुआ था तब से अगड़ी जातियों को निशाने पर रखा गया. इनमें से कई लोग राजनितिक की बहती हवाओं के साथ हो लिए तो कई अपने आक्रामक तेवर से अपनी जगह बना लिया लेकिन कायस्थ जाति न तो आक्रमक हो सकी और न हीं बहती हवाओं के साथ हुए. नतीजन हाशिये पर चले गए।लालू विरोध इस कदर हावी रहा कि भारतीय जनता पार्टी का दामन जो एक बार पकड़ा वो आज तक कायम है। भाजपा अपनी बंधुआ वोटर समझ कर इसे दरकिनार कर रखा है तो दुसरे दल इस जाति पर भरोसा नहीं कर पाते हैं। एक राजनितिक दल से जुड़े और कायस्थ संगठन के नेता के अनुसार बिहार में पिछले तीन दशकों से कायस्थ समाज टिकट से लेकर मंत्रिमंडल में शामिल करने.तक में उपेक्षा का शिकार हुए हैं। लालू प्रसाद की सरकार में यदि उन्हें स्थान नहीं मिला तो ये समाज इसलिए बर्दास्त कर लिया कि सरकार अगड़ी विरोधी मानी जाती थी, लेकिन जब राज्य में भाजपा गठबंधन की सरकार आई तो इस समाज को बड़ी उम्मीद थी कि कायस्थों का मान सम्मान बढेगा पर ऐसा हुआ नहीं. किसी भी दल ने कायस्थों को टिकट देने में या सदन में भेजने में दरियादिली नहीं दिखाई. यही कारण है कि आजादी के बाद इनका प्रतिनिधित्व घटता जा रहा है।

अखिल भारतीय कायस्थ महासभा दिल्ली पंजीकृत के मुख्य प्रवक्ता अतुल आनंद सन्नू का कहना है जिस प्रकार 30 वर्ष पूर्व की सरकार की एक गलती के बाद आज तक इस समाज के अधिकतर लोग उस नाम से परहेज करते हैं कहीं ऐसा न हो कि इस प्रकार की उपेक्षा राजग को भारी पड़ जाये. कायस्थ वाहिनी के बिहार प्रदेश अध्यक्ष अभिजित सिन्हा ने कायस्थों को मत्रिमंडल में स्थान नहीं मिलने पर रोष व्यक्त करते हुए कहा कि एक भाजपा ने मात्र तीन टिकट दिया और उस पर भी हमारे समाज ने उन सभी को विजयी बना कर भेजा बावजूद उसके कायस्थों को मंत्रिमंडल में स्थान नहीं दिया गया.

कई टर्म इन्तजार करने के बाद इस बार ये उम्मीद की जा रही थी कि इस सरकार में कायस्थों का मान-सम्मान बढेगा पर ऐसा हुआ नहीं। कायस्थों को भाजपा ने जीतने भी टिकट दिए, संयोग से वे सभी चुनाव जीत गए. राज्य में दो-दो उप मुख्यमंत्री बनाये गए पर सामाजिक समीकरण को धत्ता बताते हुए दोनों सीएम पिछड़ी जाति से बनाये दिए गए। कायस्थ संगठनों के सूत्रों के अनुसार पूरे राज्य में अंदरूनी बैठकों
का दौर जारी है. वर्ष 2017 में जब नीतीश कुमार राष्ट्रीय जना दल (राजद) गठबंधन का साथ छोड़ कर भाजपा के साथ आये थें उस वक़्त भी इस समाज को हिस्सेदारी नहीं मिली थी. उस वक़्त भाजपा के एक कायस्थ सांसद ने जमकर खुले रूप में इसका विरोध किया था। चूकि यह समाज उस वक़्त भी एग्रेसिव नहीं हुआ नतीजन उस सांसद का हीं टिकट काट दिया गया। सूत्रों के मुताबिक इस बार की स्थिति बहुत बदली हुई है. सोशल मीडिया और व्हाट्सएप्प के माध्यम से अभियान चलाया जा रहा है। भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व तक विभिन्न माध्यमों से बात पहुँचाने की कवायद जारी है. मेल, सोशल मीडिया और पत्रों के द्वारा केन्द्रीय नेतृत्व को यह बताने की कोशिश है कि “बस अब बहुत हो चूका, कलमजीवियों के सब्र का इम्तिहान अब मत लीजिये।

लेखक का परिचय-
मधुप मणि “पिक्कू”
(लेखक एक निजी चैनल के सम्पादक रह चुके हैं। वर्तमान में भारत पोस्ट लाइव और बिहार पत्रिका के सम्पादक हैं साथ हीं वेब जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के संयुक्त सचिव हैं।)

About the author

Ankit Piyush

Ankit Piyush is the Editor in Chief at BhojpuriMedia. Ankit Piyush loves to Read Book and He also loves to do Social Works. You can Follow him on facebook @ankit.piyush18 or follow him on instagram @ankitpiyush.